क्यों खबरों में
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हाल ही में US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच US–Russia अलास्का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।
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शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के रास्ते तलाशना था।
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यह बैठक वैश्विक सुरक्षा, NATO की स्थिति और भारत के रणनीतिक तथा आर्थिक हितों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पृष्ठभूमि
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फरवरी 2022 में रूस के आक्रमण के साथ शुरू हुआ यूक्रेन युद्ध वैश्विक भू-राजनीति को बदल चुका है।
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पश्चिमी देशों, जिनका नेतृत्व अमेरिका और यूरोपीय संघ कर रहे हैं:
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रूस पर प्रतिबंध लगाए।
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यूक्रेन को सैन्य और वित्तीय सहायता प्रदान की।
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भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी:
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रूस से ऊर्जा आयात जारी रखा।
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अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध गहरे किए।
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इस पृष्ठभूमि में अलास्का शिखर सम्मेलन दोनों परमाणु शक्तियों का कूटनीतिक रूप से फिर से जुड़ने और समाधान खोजने का प्रयास है।
US–Russia अलास्का शिखर सम्मेलन की मुख्य विशेषताएँ
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उत्पादक बातचीत लेकिन कोई समझौता नहीं
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ट्रम्प ने चर्चा को “बेहद उत्पादक” बताया, लेकिन माना कि कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ।
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दोनों नेताओं ने कई मुद्दों पर प्रगति का जिक्र किया, लेकिन विवरण साझा नहीं किए।
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वार्ता में अमेरिका, रूस और यूक्रेन के बीच त्रिपक्षीय बैठक की संभावना भी शामिल रही।
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परमाणु शक्तियाँ और भू-राजनीति
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ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका और रूस, दुनिया की प्रमुख परमाणु शक्तियों के रूप में, वैश्विक शांति प्रबंधन की विशेष जिम्मेदारी रखते हैं।
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शिखर सम्मेलन ने शत्रुता कम करने और शांति समाधान खोजने का संकेत दिया।
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यूक्रेन युद्ध पर ट्रम्प का रुख
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ट्रम्प ने कहा कि यदि वे 2020 के बाद राष्ट्रपति बने रहते तो यूक्रेन युद्ध नहीं होता।
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उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को रूस के साथ “समझौता करना चाहिए” और केवल युद्धविराम से आगे बढ़कर एक व्यापक शांति समाधान लाना चाहिए।
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पुतिन का बयान
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पुतिन ने ट्रम्प के इस दावे का समर्थन किया कि उनके नेतृत्व में युद्ध टाला जा सकता था।
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उन्होंने संवाद के लिए तत्परता जताई और सहयोग के क्षेत्रों पर जोर दिया:
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उच्च प्रौद्योगिकी।
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आर्कटिक क्षेत्र।
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अंतरिक्ष अन्वेषण।
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भारत की रणनीतिक दुविधा अलास्का शिखर सम्मेलन के बीच
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व्यापार शुल्क और प्रतिबंध
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अमेरिका ने रूस पर दबाव बनाने की अपनी रणनीति के तहत भारतीय निर्यात पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया।
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अमेरिकी ट्रेजरी ने कड़े प्रतिबंधों की चेतावनी दी, जिसमें एक विधेयक शामिल है जो रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था में मदद करने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की अनुमति देता है।
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यूरोप को भारत का परिष्कृत पेट्रोलियम निर्यात, जो रूसी कच्चे तेल से उत्पादित है, अमेरिकी जांच के दायरे में है।
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ट्रम्प ने दावा किया कि शुल्कों के कारण रूस ने “भारत को तेल ग्राहक के रूप में खो दिया,” लेकिन भारतीय रिफाइनरियों ने इसका खंडन किया।
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ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति
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2022 से भारत रियायती रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार रहा है:
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अब रूसी तेल भारत के कुल आयात का 35–40 प्रतिशत है।
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यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है, लेकिन पश्चिमी सहयोगियों की आलोचना झेलनी पड़ती है।
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अमेरिकी शुल्कों के बीच भारत के सामने दो विकल्प हैं:
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रूस से सस्ती ऊर्जा लेना जारी रखे और प्रतिबंधों का जोखिम उठाए।
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या अमेरिका और यूरोप के साथ निर्यात प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता दे।
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कूटनीतिक और रणनीतिक दुविधा
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भारत को रूस (रक्षा और ऊर्जा साझेदारी) और अमेरिका (रणनीतिक साझेदारी, इंडो-पैसिफिक) के बीच संतुलन बनाना होगा।
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अलास्का शिखर सम्मेलन ने द्वितीयक प्रतिबंधों के खतरे को उजागर किया, जो भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
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US–Russia अलास्का शिखर सम्मेलन का रणनीतिक महत्व
भारत के लिए
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दिखाता है कि भारत जैसे मध्य शक्तियाँ महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती हैं।
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ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति की स्वायत्तता के बीच दुविधा को उजागर करता है।
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पश्चिमी प्रतिबंधों के साथ पूरी तरह न जुड़ने से भारत के वॉशिंगटन संबंध जटिल होते हैं।
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शुल्क और प्रतिबंध भारत के व्यापार की वैश्विक वार्ताओं पर निर्भरता दिखाते हैं।
वैश्विक राजनीति के लिए
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संघर्ष समाधान में महाशक्ति राजनीति की केंद्रीयता को मजबूत करता है।
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ट्रम्प ने यूक्रेनी और यूरोपीय नेताओं को जानकारी दी, लेकिन NATO और पश्चिम के भीतर सहमति अभी भी अनिश्चित है।
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यह शिखर सम्मेलन यूक्रेन को लेकर तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद US–Russia जुड़ाव का प्रतीक है।
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संभावित प्रभाव:
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NATO–यूक्रेन रणनीति।
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यूरोप की सुरक्षा संरचना।
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US–Russia संबंधों में बदलाव चीन, भारत और वैश्विक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
भारत का आगे का रास्ता
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कूटनीतिक संतुलन
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भारत को रूस (रक्षा, ऊर्जा) और अमेरिका (तकनीक, व्यापार, इंडो-पैसिफिक रणनीति) के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
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पश्चिम के साथ साझेदारी मजबूत करना
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भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ इन क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ानी चाहिए:
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व्यापार।
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महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियाँ।
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आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण।
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शुल्क राहत की उम्मीद
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भारतीय सरकार को उम्मीद है कि यूक्रेन शांति वार्ता के परिणाम के आधार पर ट्रम्प शुल्कों को टाल सकते हैं या पुनर्विचार कर सकते हैं।
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निष्कर्ष
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अलास्का शिखर सम्मेलन यूक्रेन में शांति वार्ता की ओर एक प्रारंभिक लेकिन महत्वपूर्ण कदम है।
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चर्चाएँ सकारात्मक रहीं लेकिन ठोस परिणाम न मिलने से कूटनीति की नाजुकता सामने आती है।
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रूस के लिए यह सम्मेलन प्रतीकात्मक वैधता लाया।
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भारत के लिए यह रणनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता का माहौल लेकर आया।