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मास्टर ऑफ रोस्टर

मास्टर ऑफ रोस्टर

मास्टर ऑफ रोस्टर | UPSC Compass

क्यों चर्चा में
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज को “अविवेकपूर्ण” आदेश के लिए फटकार लगाई।
  • इससे यह बहस शुरू हुई कि क्या सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के आंतरिक कार्यों में हस्तक्षेप कर सकता है, खासकर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ शक्तियों में।
  • इस घटना ने न्यायिक स्वतंत्रता, संस्थागत अखंडता और अनुच्छेद 141 और 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों के दायरे को लेकर संवैधानिक प्रश्न खड़े किए।
पृष्ठभूमि
घटना
  • सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन) ने निर्देश दिया कि न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार (इलाहाबाद हाई कोर्ट) को एक वरिष्ठ जज के साथ बैठाया जाए।
  • उन्हें सेवानिवृत्ति तक आपराधिक रोस्टर संभालने से भी रोका गया क्योंकि उनका आदेश “त्रुटिपूर्ण” था।
आपत्ति
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों और मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली ने इसे मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक शक्तियों में हस्तक्षेप बताया।
संशोधन
  • सीजेआई बी.आर. गवई के पत्र के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका मुख्य न्यायाधीश की ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ अधिकारिता को कमजोर करने का कोई इरादा नहीं था।
मुख्य संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांत
मास्टर ऑफ रोस्टर सिद्धांत
  • मुख्य न्यायाधीश (सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट) को पीठ गठित करने और मामलों के आवंटन का विशेष अधिकार।
  • प्रमुख निर्णय:
    • राज्य बनाम प्रकाश चंद (राजस्थान, 1998) – केवल मुख्य न्यायाधीश ही जज-मामले का आवंटन तय कर सकते हैं।
    • राज्य बनाम देवी दयाल (राजस्थान, 1959) – हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एकल/विभागीय पीठों की संरचना तय करते हैं।
    • मयावरम फाइनेंशियल कॉरपोरेशन (मद्रास हाई कोर्ट, 1991) – मुख्य न्यायाधीश को न्यायिक कार्य आवंटन के लिए अंतर्निहित शक्तियां प्राप्त हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पदानुक्रमीय भूमिका
  • अनुच्छेद 141 – सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है।
  • अनुच्छेद 142 – सुप्रीम कोर्ट “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए आदेश जारी कर सकता है।
  • तिरुपति बालाजी डेवलपर्स केस (2004) – सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक प्रशासन में “बड़े भाई” के रूप में देखा गया, लेकिन उसे हाई कोर्ट पर पर्यवेक्षण का अधिकार नहीं है।
न्यायिक स्वतंत्रता बनाम निगरानी
  • हाई कोर्ट स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट केवल दुर्लभ मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जब कानून के शासन को खतरा हो।
उठे मुद्दे
  • रोस्टर आवंटन पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को प्रशासनिक निर्देश देने में सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों का दायरा।
  • हाई कोर्ट की स्वायत्तता को कमजोर किए बिना न्यायिक अनुशासन बनाए रखना।
  • बार-बार न्यायिक त्रुटियों से बचने के लिए अनुच्छेद 142 का निवारक रूप से उपयोग।
  • न्यायपालिका के भीतर पदानुक्रम और स्वतंत्रता के बीच संतुलन।
इन-हाउस तंत्र बनाम सार्वजनिक फटकार
औपचारिक प्रक्रिया
  • गंभीर कदाचार या अक्षमता के लिए (संसद द्वारा) महाभियोग।
  • छोटे मामलों के लिए इन-हाउस जांच।
सुप्रीम कोर्ट का कदम
  • गोपनीय प्रक्रिया के बजाय खुले न्यायालय में सार्वजनिक निर्देश जारी किया।
  • कार्रवाई सुधारात्मक थी (वरिष्ठ जज के साथ बैठाना, आपराधिक रोस्टर हटाना) न कि दंडात्मक।
आगे की राह
  • यह स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाना कि सुप्रीम कोर्ट कब हाई कोर्ट के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • इन-हाउस तंत्र को मजबूत करना ताकि न्यायिक आचरण के मामलों को गोपनीय तरीके से निपटाया जा सके।
  • संवेदनशील मामलों में बार-बार गलतियों से बचने के लिए जजों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देना।
निष्कर्ष
  • ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ सिद्धांत न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन यह एक पूर्ण ढाल नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण सुधारात्मक कदम उठाने के अधिकार हैं, लेकिन ऐसे कदमों से हाई कोर्ट की स्वायत्तता कमजोर नहीं होनी चाहिए।